यूरोपीय संसद में बुधवार को नागरिकता संसोधन कानून (सीएए) पर बहस होगी। इसके बाद गुरुवार को इस पर वोटिंग की जाएगी। पिछले सप्ताह यूरोपीय संसद के 751 में से 600 सदस्यों ने नागरिकता कानून के खिलाफ संसद में 6 प्रस्ताव रखे थे। प्रस्ताव में सांसदों ने कहा था कि भारत सरकार द्वारा लागू किया गया नागरिकता कानून भेदभाव वाला और विभाजनकारी है। इससे बड़ी संख्या में लोग स्टेटलैस यानि बिना नागरिकता के हो जाएंगे।
लोकसभा स्पीकर ने प्रस्ताव पर आपत्ति जताई थी
प्रस्ताव पर भारत ने कहा था कि सीएए हमारा आंतरिक मामला है। लोकसभा स्पीकर ओम बिड़ला ने सांसदों के प्रस्ताव की निंदा की थी। उन्होंने यूरोपीय संसद के अध्यक्ष डेविड मारिया सासोली को पत्र लिखकर कहा था कि एक विधान मंडल का दूसरे विधान मंडल पर फैसला देना सही नहीं है। इस चलन का निहित स्वार्थों द्वारा दुरूपयोग किया जा सकता है। इंटर पार्लियामेंट्री यूनियन के सदस्य होने के नाते हमें कानून बनाने की लोकतांत्रिक प्रक्रिया का सम्मान करना चाहिए।
‘नागरिकता कानून अल्पसंख्यकों के खिलाफ’
सांसदों ने प्रस्ताव में आरोप लगाया था कि भारत सरकार द्वारा लाया गया यह कानून अल्पसंख्यकों के खिलाफ है। यह कानून धार्मिकता के आधार पर भेदभाव करता है। ऐसा करना मानवाधिकार और राजनीतिक संधियों की भी अवमानना है। इसे अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार समझौते के अनुच्छेद-15 का भी उल्लंघन बताया गया, जिस पर भारत ने भी हस्ताक्षर किए हैं।
भारत सरकार ने विरोध में उठी आवाज दबाई: सांसद
यूरोपीय सांसदों के इस प्रस्ताव में भारत सरकार पर भेदभाव, उत्पीड़न और विरोध में उठी आवाजों को चुप कराने का आरोप लगाया गया है। इसमें कहा गया कि नए कानून से भारत में मुस्लिमों की नागरिकता छीनने का कानूनी आधार तैयार हो जाएगा। साथ ही, नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) के साथ मिलकर सीएए कई मुस्लिमों को नागरिकता से वंचित कर सकता है। सांसदों ने यूरोपीय संघ से इस मामले में दखल देने की मांग भी की।
सांसदों का आरोप- प्रदर्शनकारियों पर गोलियां बरसाईं गईं
प्रस्ताव में यह भी कहा गया कि सीएए का पूरे भारत में विरोध किया गया। कई यूनिवर्सिटियों में प्रदर्शन किया गया। भारतीय अधिकारियों ने प्रदर्शन को रोकने के लिए इंटरनेट शटडाउन किया। उत्तर प्रदेश में सैकड़ों प्रदर्शनकारियों पर लाठियां बरसाईं गईं, उन्हें गोली मारी गई और जेलों में डाला गया। सांसदों ने कहा कि इंटरनेट शटडाउन करना सूचना का इस्तेमाल करने के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है।